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18 दिसंबर 2024

ज़िंदगी और चाय


 

ज़िंदगी और चाय, एक सी ही तो होती है। 

तन के कप में, वक्त के हर घूँट के साथ कम होती, 

और मन माँगता है, एक कप और हो जाए। 

कुछ यादें बेस्वाद पानी सी, कुछ दूध सी साफ़, उजली।

कुछ कड़वी चाय की पत्ती सी, कुछ शक्कर की तरह मीठी सी। 

कुछ अदरक की तरह तीखी तीखी, कुछ एलाइची सी ख़ुशबूदार,

कभी कड़क तो कभी कटिंग सी, जीवन की भागदौड़ में खौलती हुई। 

ज़िंदगी और चाय, एक सी ही तो होती है।

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